रास्ता पता है मगर..मंजिल से अनजान हूँ

रास्ता पता है मगर..मंजिल से अनजान हूँ

Wednesday, 15 June 2016

दिल्लीफरनमा पार्ट- 1 'एक्सेप्टेड! हेल येह!!' ('Accepted! Hell Yeah!!')

#दिल्लीफरनमा पार्ट- 1
जैसा की नाम कहता है- दिल्ली का सफरनामा.
तो मैं इस पोस्ट में अपने "सफ़र दिल्ली का" आपके साथ बांटने जा रहा हूँ.
शायद इसके बाद भी इसकी अन्य श्रृंखला आ सकती है. क्यूंकि एक ही पोस्ट में 3 साल को संभाल लेना
मेरे बस की न है, और शायद आपके लिए भी उबाऊ हो जाए.
मेरे एक जान पहचान के भैया थे- इशू नाम था उनका. मतलब अब भी है. लेकिन बहुत समय से उनके संपर्क में नहीं हूँ.
उन्होंने लखनऊ से बी.टेक किया था, तब मैं शायद 11th में रहा हूँगा. जब उन्होंने बताया कि मौका मिले तो, किसी मेट्रो सिटी में जा कर
पढना. तुझे बहुत कुछ सीखने को मिलेगा. यही बात मेरे मन में घर कर गयी.
तो जब पापा ने पूछा की आगे क्या करना चाहते हो..?? 12th के एग्जाम से पहले ही. तो मैंने यही बात पा से कही. पा ने मुझसे मजाक
में ही पुछा - "मेट्रो सिटी का मतलब क्या होता है, जिसमें मेट्रो ट्रेन चलती हैं क्या वो..?"
मैं हल्का सा मुस्कुराया. "नहीं, जिसकी पापुलेशन 10 लाख से ज्यादा होती है." बदले में वो भी मुस्कुराए! मैं पास हो चूका था उनकी इस कठिन परीक्षा में.
हमारे स्कूल से ही हमारे दो सीनियर कमल पन्त और आशुतोष भट्ट दिल्ली यूनिवर्सिटी में एडमिशन ले चुके थे. तो हम लोग भी कहीं न कहीं
सपने देखने लगे थे की, क्या पता... शायद... हमारा भी...
जैसा पढ़ा था, उसी के हिसाब से रिजल्ट भी आया. इंजिनियरिंग में मेरी ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी, अगर सच पूछो तो.. वो तो घर वालों के कारण
ही मैंने EEE का फॉर्म भर दिया था. रिजल्ट भी कुछ वैसा ही रहा, जैसा एग्जाम गया था. बकवास!!
आई डायल्ड नंबर ऑफ़ कमल भैया. उनको बताया मैंने अपने रिजल्ट के बारे में. एंड ही सेड ,"येह! यू विल गेट थ्रू इट." सो आई एनरोल्ड माइसेल्फ, सच कहूँ
तो ये काम भी उस कमल भैया ने ही किया था. आफ्टर आल ही वाज द मैन विथ एक्सपीरियंस. सारी फॉर्मलेटीज पूरी कर दी मैंने बांकी.
पहली कट ऑफ जब जारी हुई तो मैं चार्ली साइबर कैफ़े पहुंचा. आई चेक्ड आल एंड अगेन डायल्ड टू कमल. मैंने बताया उनको पूरा.
एंड आई आस्कड इफ आई विल गेट थ्रू!! ??
ही सेड -" हाँ भाई तुझे सबमें मिल जाएगा. जिस-जिस कोर्स के लिए तूने अप्लाई किया था."
बहुत खुश था मैं. फाइनली आई वाज एक्सेप्टेड!!
"तो मैं कब निकलू एडमिशन के लिए..??, मैंने तभी पूछ लिया.
"आज ही निकल ले... लेकिन तू वहां रुकेगा कहाँ पे.."
"चाचा रहते हैं,  गाजियाबाद में... वहां से कैसे पहुंचना है..?"
"देख.. तुझे आनंद विहार से 543 नंबर की बस मिलेगी, ध्यान से देख लेना बस का नंबर.."
"ठीक है.. 543!!"
"उससे कहना धौलाकुआं की टिकट देने को.."
"क.. कितने का टिकट बनेगा..और कितना दूर है वो... धौलाकुआं..?"
"ज्यादा नहीं.. बस 25रु का टिकट मिलेगा, टिकट कंडक्टर के पास ही बैठ जाना.
उससे कह देना आत्माराम कॉलेज उतरना है, वो उतर देगा. और लगभग डेढ़-दो घंटे तो लग ही जायेंगे"
"ठीक है, भैया, आप कब जा रहे हो दिल्ली..?" आई वांटेड टू नो इफ ही कैन हेल्प मी अहेड, ड्यूरिंग दिस प्रोसेस..
"अभी तो आया ही हूँ भाई, तू चिंता न कर, मैं फ़ोन पे अवेलेबल रहूँगा." शायद मेरी चिंता को भांप गए थे.
मैंने पा को बताया सब कुछ.!! उनके चेहरे पे  थोड़े रिलैक्स्ड वाले एक्सप्रेशन आ गए थे.
जब मैं क्लास 5th में था, तभी से मैंने अकेले जर्नी करना शुरू कर दिया था. पा वांटेड मी टू स्टार्ट टेकिंग रेस्पोंसबिलिटी.
ज्यादा दूर तक तो नहीं, लेकिन हाँ, रुद्रपुर (जो कि लगभग 70km कि दूरी पर था) तक तो आना जाना शुरू हो गया था.
और  जब मैं पहली बार मैंने ऑलमोस्ट 1000km ट्रेवल किया, तब मैं 9th स्टैण्डर्ड में था.
इसीलिए पा के साथ एडमिशन के लिए जाने का सवाल तो बनता ही नहीं था. उसी रात को ही मैं दिल्ली के लिए बस से निकला.
25-जून-2012 को पहली कटऑफ रिलीज किया गया था, और 26 को मैं दिल्ली पहुँच चूका था. चाचा-चाची घर पर
नहीं थे. घर पर बस मेरे चचेरे भाई -बहन मौजूद थे. सुबह लगभग 9 बजे मैं आनंदविहार ISBT पहुँच गया था.
सबसे पहली जिस बस पर मैं चढ़ा, इट वाज 534 टू महरौली. मैंने जल्दी मैं उसको 543 समझ कर अन्दर घुस गया. लेकिन बाद मैं जब पता चला
तो मैं नीचे उतर कर उसको दूंढ़ने में लग गया. ज्यादा मसक्कत नहीं करनी पड़ी. कंडक्टर के बगल वाली सीट में ही बैठा.
वैसा ही किया जैसा मुझे बताया गया था. रस्ते भर में, मैं उसको याद दिलाता रहा की , भाई मुझे वहां उतरवा देना.
यही कोई 3-4 पूछ डाला- भैया, अब कितना दूर रहता है..? रस्ते में AIIMS भी दिखा था. सब कुछ पहली बार ही था.
ट्रैफिक ने उतना परेशान नहीं किया. लेकिन मुझे फिर भी सफ़र बड़ा लम्बा लग रहा था. फाइनली लगभग 11.15 बजे के आसपास
जब कंडक्टर ने कहा, ले भाई आ गया तेरा स्टॉप..!!. थोडा नर्वस हो गया था, सुन के! मैंने उतरते हुए उसको एक बार मुड़ के देखा, बड़ा खुश नज़र आ रहा था..  शायद परेशान करके रख दिया होगा..
कॉलेज का 'गेट' वाजन्ट टू इम्प्रेस्सिव. आई स्टील रेमेम्बेर दोज फेंसज/बाउंड्री. लेकिन फिर भी अच्छा लगा रहा था.
अन्दर पहुंचा, काफी चहल-पहल थी. मेन कॉरिडोर का शटर लगा था. बाहर गार्ड्स लगे थे. वहां से सिर्फ स्टूडेंट्स को अन्दर जाने की इज्ज़ाज़त थी.
मैंने पता किया, हमारे कोर्स का रूम कौन सा था..? एंड दे पॉइंटेड टुवर्ड्स रूम नंबर 8. ज्यादा क्राउड तो नहीं था.फिर भी यही कोई 20-35
बच्चे बैठे होंगे. मैं अन्दर गया. पता किया क्या क्या प्रोसीजर है, फॉर्म भरने के.. आई वाज रियली स्प्राइज्ड व्हेन देयर अ ए टीचर सेड टू मी..
"शिक्षा भारती से इंटर किया है तुमने..??"
मैंने हाँ में जवाब दिया. और पुछा की आप कैसे जानते हैं..??
"पुराने कुछ बच्चे है, वहीँ से", मैंने सोचा ये पक्का कमल या आशुतोष की बात कर रहे होंगे.
"ओह..",  (बाद में लैब के दौरान, मैंने बाद में रियलाइज किया कि वो फिजिक्स लैब के टीचर थे.)
देन ही आस्कड लूकिंग एट माय मार्कशीट..
"यार, प्रैक्टिकल में तो तुम्हें पूरे 30 मिले हैं, लेकिन थ्योरी में 63 ही बस..?" , वो फिजिक्स के नंबरों की बात कर रहे थे.
फिर वो समय ध्यान मैं आने लगा.. जब मैं क्लास 12 में फिजिक्स के प्रैक्टिकल में एग्जामिनर के सामने खड़ा था.. और वो सवाल पे सवाल पूछ जा रहे थे..
की तभी पालिवाल सर ने उनको कहा- "नर्वसाओ मत यार..! क्लास में तो तुम अच्छे से सारे आंसर बताते हो.. "
इसपें मैं कुछ और फ़्लैश बेक में चला गया, जब कल्याण सर ने कहा था..
"कि डियर ये मैटर नहीं करता की आपका प्रैक्टिकल (वाय-वा) कैसा जाएगा, बल्कि वहां पे, ये मायने रखता की आपका सब्जेक्ट टीचर ये कह दे कि
'भई! क्लास में तो तुम अच्छे हो..' , बस आधे से ज्यादा आपका काम वहीँ हो जाता है.
"ठीक है!! अब जल्दी से इसे भर के सबमिट करो..", 
"ओके!", मैं उधर ख्यालों से बाहर आया, और मुस्कुरा कर कहा.
मिड रोअ की फोर्थ सीट पे मैं जा बैठा. और शुरू कर दिया फॉर्म को भरना. काफी दौड़-भाग हुई, कॉलेज से सत्यनिकेतन , सत्यनिकेतन से फिर कॉलेज.
रूम से ऑफिस, तो कभी रूम से कंप्यूटर लैब. दो डाक्यूमेंट्स अब भी अधूरे थे. उसके लिए उन्होंने एप्लीकेशन लिखवाया. डेएम इट!
मैं वही क्लास में बैठा था, की जब वो आई कॉलेज की मेरी पहली होने वाली दोस्त. उसको कुछ प्रॉब्लम हो रही थी, फॉर्म भरने में.
तो मैंने उसे बताया. आई हेल्पड हर. एंड शी सेड थैंक यू टू..!! श्वेता वाजपेयी नाम था उसका. शी वाज इन इंडस्ट्रियल केमिस्ट्री डिपार्टमेंट
और मैं तो कंप्यूटर साइंस का बंदा था. एनीवे.. नीचे कैंटीन के पास बैडमिंटन कोर्ट पे टेंट लगाया गया था. काफी भीड़ थी वहां. कॉज वहीं
पे पेमेंट एंड अदर फोर्मैलिटीज होनी थी. मेरा काम उस एक दिन में नहीं हो पाया. करीब 3.30 पे मैं वहां से निकला.
अब मुझे इसके बाद बस पेमेंट करना था. और ऑफिस 10 बजे सुबह खुलता है, पता लगा लिया था मैंने.
काफी थक गया था.. इतनी भाग-दौड़ के बाद. शाम को घर पहुँच के मुझे इत्ती ख़ुशी मिली, मानो जैसे मुझे स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर की ट्राफी मिलने
वाली हो.
अगले दिन सुबह ही मैं 8.30 बजे निकल पड़ा कॉलेज पे. वही बस . वही रूट. और कमाल तो देखिये वही उतरा मैं. :D
मैंन फॉर्म ले कर मैं फीस सबमिशन की लाइन में लग गया. और लगभग 1 घंटे बाद , आई वाज डन.. सो रीलिव्ड....
1.30 तक मैं घर पहुँच गया. यानी पहले कटऑफ के दुसरे दिन ही मैंने एडमिशन प्रोसीजर पूरी कर ली, लेकिन फिर भी मुझे 4th
रोल नंबर मिला. यानी रोल न. - 104. और ये तो मुझे बाद में पता चला की मुझसे पहले 3 बन्दे एडमिशन करा चुके थे.
इतनी जल्दी एडमिशन करवाने के लिए तीनों साल दोस्त चिढाते रहे.
"साले! एडमिशन करवाने की इत्ती जल्दी क्या थी..? पहले दिन ही आके बैठ गया था क्या...??"
   टू बी कंटिन्यूड....
(हालांकि तस्वीर दुसरे सेमेस्टर की है.. लेफ्ट से  विवेक, मैं, मनीष और संदीप)
आपके कमेंट्स सादर आमंत्रित है...
:- #MJ_की_कीपैड_से

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