#दिल्लीफरनमा_पार्ट - 2
सो अब सीन कुछ ऐसा था कि आई वाज एक्सेप्टेड इन डी.यू.
कॉलेज 23 जुलाई से स्टार्ट होने वाले थे. काफी टाइम था बचा इधर कुछ सपनों को देखने के लिए, कुछ प्लानिंग्स के लिए.
सबसे पहले सोचा आराम से पी.जी. मैं रहूँगा. कभी कभी ख्याल आता की चाचा के साथ रह लूँगा. की तभी मुझे
किसी ने स्ज्जेस्ट किया की , ड्यूड किसी रिश्तेदार के यहाँ मत रुक, जिनकी फैमिली है..! गन्दा सीन हो सकता है.
उस वक़्त नहीं समझ आया की व्हाट कुड पोस्सिब्ली गो रॉंग..? लेकिन अब समझ आ गया कि किसी
परिवार वाले रिश्तेदार के साथ न रहने के फायदे क्या-क्या हो सकते हैं, और नुकसान भी..!!
दुसरे ख्यालों में ये भी था, कि जा कर गिटार के लेसंस लूँगा, देन आई विल बाय अ गिटार टू वनडे! वहां जा के आई विल स्टार्ट गिविंग
ट्यूशन, एक्स्ट्रा कैश मिल जायेंगे, यू नो, अपने शौक पूरे करने के लिए. हर एक सेमेस्टर में नयी
गर्लफ्रेंड बनाऊंगा. :D लड़कियों से दोस्ती कर के उनके लंच शेयर करूँगा. और सबसे फनी- "यार! यूनिवर्सिटी टॉप कर दूंगा.
फाड़ दूंगा देख लियो..!!" :D :D और हाँ, जैसा मेरा इंटरेस्ट था, म्यूजिक में. सो आई विल वर्क ऑन इट टू.. मेय बी आई विल जॉइन
सम काइंडा म्यूजिक और कल्चरल सोसाइटी इन कॉलेज..!!
धीरे-धीरे दिन पास आ रहे थे, वहां जाने के. एक नयी जिन्दगी शुरू होने वाली थी. मैं खुश तो रहता ही था, लेकिन इन
दिनों थोडा नर्वस रहता था. ओवियस्ली पहली बार घर से बाहर रहने को जा रहा था. अब तक रहने का कोई जुगाड़ नहीं था , यही कोई 7-8
दिन रह गए होंगे. तब ख्याल आया, यार कुछ जुगाड़ करना चाहिए रहने के लिए. मैंने पा से कहा- "पा, पी.जी. वुड बी फाइन आई गेस..!!"
मैं उनको जताना चाहता था की मैं सर्वाइव कर लूँगा इवन पी.जी में भी. लेकिन मैं अन्दर से खुश था की अगर ऐसा हो गया तो अच्छा रहेगा
काफी टाइम बच जाएगा पढने के लिए. हंसिये मत, स्टार्टिंग का जोश था वो, हाँ तो उस समय पढने का ही ख्याल आया, गौर कीजियेगा
बचे हुए टाइम में..!! :p लेकिन नहीं, मेरी दाल नहीं गली. पा ने अपना फैसला सुनाया- "तू खुद खाना बना के रहेगा..!! क्या दिक्कत है
उसमें..? खुद बनाएगा, अच्छा ही बनाएगा. और अगर अच्छा बनाएगा तो अच्छा ही खायेगा. तू उधर अच्छे से रहेगा-खायेगा, तो यहाँ हम लोग चैन
से सो सकेंगे. नहीं तो हमेशा चिंता लगे रहेगी. एक तो तेरा शरीर ऐसा है कि..."
मैं चुप था, बस कह दिया.. ठीक है..!! नहीं आई वाज'न्ट हैप्पी एट देट मोमेंट. बट इफ यू आस्क मी नाउ, आई वुड टेल- देट वाज ग्रेट स्टेप!
मैंने अपने बड़े भैया को कॉल किया, जैसा की वो मुझसे पहले दिल्ली में रह चुके थे, तो उनके कांटेक्ट में होंगे कई बन्दे!
यू नो, हु कैन फाइंड मी अ प्लेस टू स्टे! मैंने बता दिया की मेरा कॉलेज धौलाकुआं में है, सो इट वुड बी ग्रेट इफ यू फाइंड सम प्लेस नियर बाय.
दो-तीन के बाद उनको कॉल आता है कि, ड्यूड! देयर इज प्लेस 'नारायणा' , व्हिच इज आल्सो नियर टू योर कॉलेज. एक ही बंदा है वो, हु इज वर्किंग टू.
और हाँ वो भी बिहार का है. आई गेस! इट विल बी फाइन..विल नॉट इट..?
ही गेव मी हिज कांटेक्ट नंबर. पा न उससे मैथली (भाषा) में ही बात करना ठीक समझा. सब ठीक ही चल रहा था. सो अब रुक्सत का पल आ गया था.
रात को ही मैं बस से निकला. पा ही आये थे, स्टैंड तक छोड़ने. काफी कुछ था उनकी आँखों में. उम्मीदें, आशाएं, गर्व, प्यार और चिंता भी. मैं शायद रो देता.
लेकिन, नहीं रोया मैं..!! लड़का ही था. जैसा हमें बचपन में कहा जाता है- 'लड़के नहीं रोते हैं, बच्चे.!!' कुछ ऐसा ही हुआ.
मैं उनको कहना चाहता था- "पा, आई विल डू माय बेस्ट". लेकिन वो भी अनकहा रह गया. हिम्मत नहीं कर सका.
बस सुबह आनंद विहार पहुँच गयी. मैं उतरा, मेट्रो स्टेशन गया. नहीं, इट वाजन्ट माय फर्स्ट राइड. आई हेड डन बिफोर. ब्लू लाइन के ही
शादीपुर मेट्रो का टोकन लिया. वहां कुछ यही 40 मिनट बाद मैं उतर गया. एज आई वाज इंस्ट्रकटेड बाय माय अपकमिंग रूम पार्टनर.
फिर भी श्योर होने के लिए, आई आस्कड द डायरेक्शन टू अ गर्ल. देयर वाज डीटीसी बस स्टैंड. वहां पहुंचा. शायद 753 रूट की बस थी.
मैंने पूछा- अंकल! पायल सिनेमा जायेगी..? एंड ही नोडेड. कुछ सेकंड बाद मैंने खुद को और मेरे पिठ्ठू बैग, एक छोटा ब्रीफ़केस, (जिसमें
मोस्टली किताबें रखी थी) , और एक बैग (जिसमें बिस्तर और कपड़े थे ) को अन्दर पाया.
"कितने का टिकट लगेगा..?", मैंने पूछा.
"5 का", आई वाज सप्राइज्ड विथ हिज आंसर. सोचा- बस! 5 रु..??
( देट वाज माय फर्स्ट टाइम टू इन डीटीसी )
उसने मेरी और टिकट बढ़ाया.
"अंकल! बता दीजियेगा जब स्टॉप आ जाए.." कह कर मैं सामान को गेट पर से हटाने लगा.
अभी मुझे बस में 5 मिनट भी नहीं हुए थे, जब उसी ने कहा-
"पायल सिनेमा वाले उतर जाओ, स्टॉप आ गया भई!!"
मैं अपना तीनों सामान ले कर उतरा. वहां रिक्शे वाले से गुरुद्वारा के बारे में पूछा..
वो कुछ बता तो रहा था. लेकिन मैंने सोचा आई शुड कॉल हीम.
तो भैया जो की मेरे अपकमिंग रूम मेट होने वाले थे, शिवम नाम था उनका.. उन्होंने कहा की फ़ोन रिक्शे वाले को दो, मैं उसे समझा देता हूँ.
तो फिर एक मिनट बाद मैं रास्ते में था. और यहाँ किसी अजनबी की तरह अपने चारों ओर देख रहा था. चीजों को याद रखने की कोशिश कर रहा था.
स्टॉप से पीछे की ओर पहला लेफ्ट, देन एक टंकी के पास से लेफ्ट.. देन..
मैं ये भी सोच रहा था, कि कैसे होंगे वो शिवम भैया! कैसा रहेगा मेरा सफ़र..??
ज्यादा दूर तो नहीं था शायद! एक बोर्ड के पास एक आदमी को खड़ा देखा मैंने, बोर्ड के ऊपर किसी गाँव का नाम था.
"लो भैया, हम आ गए, जहाँ फ़ोन पे उन्होंने छोड़ने को कहा.."
टी-शर्ट और शॉर्ट्स में, चेहरे पर बिहार वाली मासूमियत लिए उस आदमी को मैंने अपनी ओर बढ़ते देखा.
"शिवम भैया...??", मैंने पूछा.
"हाँ."
"नमस्ते!" देन वी शूक्ड आवर हैंड्स टू. मैंने रिक्शे वाले को 30रु दिए. और वो मुड़ गया वापस.
गली ज्यादा चौड़ी नहीं थी, उन्होंने मेरे ब्रीफ़केस को अपने हाथों में लिए. अच्छा लगा मुझे!
हम बढ़ते गए, और गलियाँ और पतली होती गयी. ज्यादा दूर नहीं था, वहां से. फिर कुछ देर बाद मैं खुद को एक बड़ी से 6 स्टोरी बिल्डिंग को देखते
हुए पाया.
"कौन सा फ्लोर है भैया अपना ..?" मैंने पुछा.
"4th" , उन्होंने कहा.
रास्ते में बातें शुरू हो गयी थी हमारे बीच. सफ़र कैसा रहा, उन्होंने पुछा था मुझसे.
48 सीढियां चढ़ने के बाद, हम एक लॉक्ड डोर के सामने रुक गए.
"लो, आ गया." उन्होंने कहा. हम दोनों रूम के अन्दर घुसे.
एक सिंगल बेड, जिसमें दो बन्दे सो सकते थे. बेड के आगे छोटा सा टीवी. टीवी के पास छोटा सा म्यूजिक सिस्टम. और हाँ, वहां भी फोग्ग चल रहा था.
:D दो-तीन फोग्ग के कैन थे. एक बेड के बाद उतने ही साइज़ का बेड लग सकता था, इतनी स्पेस बची थी. आगे छोटा सा किचन था.
जिसमें दो आदमी खड़े होकर आराम से खाना बना सकते थे. रूम बैचलर के हिसाब से काफी साफ़ था. चीज़ें लगभग अपनी जगह पर थी.
सबसे कूल चीज़ वहां की बालकनी थी. हाइट काफी ठीक थी. उसको लोहे के रॉड से फेंस किया गया था, जिस्पें काला पेंट चढ़ा था.
वहां एक स्टूल लगा था. जिसपे बैठ के घूमा जा सकता था. यानी वो घूमने वाली स्टूल था, बिना व्हील्स के. पास में ही वहां एक स्कूल भी था.
जिसका ग्राउंड काफी छोटा था. पास में ही वाशिंग मशीन था. हालत से वो ख़राब ही लग रहा था. किचन में कोने पे एक सिंक लगा था.
दो प्लेटफार्म वाला गैस था. और शायद सिलेंडर वो छोटा वाला ही यूज़ कर रहे थे.
शिवाजी (डी.यू.) से ही उन्होंने अपना ग्रेजुएशन किया था, कॉमर्स से. किसी प्राइवेट बैंक में मेनेजर थे.
अच्छा लगा मुझे अपना नया घर. वो 10 के आसपास ऑफिस को निकल गए. इधर मैंने ब्रेकफास्ट कर सबको फ़ोन कर दिया.
मम्मी,पा और दादा जी से फ़ोन पे बात कर के मैंने टीवी ऑन किया. लेकिन नींद आ रही थी, तो मुझे सोने जाना पड़ा.
लगभग शाम को मै 4-5 जगा. उठ के हाथ मैं पानी की बोटल लेकर मैं उस स्टूल पे जा बैठा. उस स्कूल में कराटे की क्लास्सेज चल
रही थी. मुझे अच्छा लग रहा था, वहां बैठना. एक शान्ति थी उस पल में. रात को भैया आये. वी कुक्ड आवर डिनर.
उन्होंने मुझसे पुछा- खाना बना लेते हो, नीकू..?
हाँ, इसी नाम से बुलाने लगे मुझे! अच्छा लग रहा था उनसे ये नाम सुनना..
"नहीं भैया, ज्यादा कुछ नहीं. खिचड़ी बना लेता हूँ, चाय बना लेता हूँ, बनी रोटी पे घी लगा लेता हूँ तवे पर और हाँ मैग्गी भी."
वो हँस पड़े. "और रोटी-चावल..?"
"चावल तो बना लेता हूँ, लेकिन रोटी बनानी नहीं आती."
"चल कोई न, सीखा दूंगा मैं."
"चाय पीता है..?"
"नहीं भैया, इन्फेक्ट घर पर कोई नहीं पीता है"
"अच्छा...?"
"हाँ.."
हमने खाना लगाया. भैया ने टीवी ऑन किया. और स्टार प्लस लगाया..
कोई डेली सोप आ रहा था. नाम याद नहीं मुझे.
मुझे हंसी आ रही थी.. आखिर पहला बंदा जो मिला था, डेली सोप देखने वाला.
आई मीन नया होता है कुछ.. यहाँ के सीरियल्स में..? वही लव अफेयर, फिर शादी, फिर सास बहु, फिर लीड एक्टर का याद्दास्त जाना,
फिर पुनर्जन्म, फिर प्लास्टिक सर्जरी, फिर उनके बच्चे, और फिर वही कहानी... :D :D
और फिर हम सो गए. डे आफ्टर नेक्स्ट डे, मेरा कॉलेज स्टार्ट होने वाला था.. आई वाज एक्साइटेड एंड लिटिल नर्वस टू..
टू बी कंटिन्यूड......
सो अब सीन कुछ ऐसा था कि आई वाज एक्सेप्टेड इन डी.यू.
कॉलेज 23 जुलाई से स्टार्ट होने वाले थे. काफी टाइम था बचा इधर कुछ सपनों को देखने के लिए, कुछ प्लानिंग्स के लिए.
सबसे पहले सोचा आराम से पी.जी. मैं रहूँगा. कभी कभी ख्याल आता की चाचा के साथ रह लूँगा. की तभी मुझे
किसी ने स्ज्जेस्ट किया की , ड्यूड किसी रिश्तेदार के यहाँ मत रुक, जिनकी फैमिली है..! गन्दा सीन हो सकता है.
उस वक़्त नहीं समझ आया की व्हाट कुड पोस्सिब्ली गो रॉंग..? लेकिन अब समझ आ गया कि किसी
परिवार वाले रिश्तेदार के साथ न रहने के फायदे क्या-क्या हो सकते हैं, और नुकसान भी..!!
दुसरे ख्यालों में ये भी था, कि जा कर गिटार के लेसंस लूँगा, देन आई विल बाय अ गिटार टू वनडे! वहां जा के आई विल स्टार्ट गिविंग
ट्यूशन, एक्स्ट्रा कैश मिल जायेंगे, यू नो, अपने शौक पूरे करने के लिए. हर एक सेमेस्टर में नयी
गर्लफ्रेंड बनाऊंगा. :D लड़कियों से दोस्ती कर के उनके लंच शेयर करूँगा. और सबसे फनी- "यार! यूनिवर्सिटी टॉप कर दूंगा.
फाड़ दूंगा देख लियो..!!" :D :D और हाँ, जैसा मेरा इंटरेस्ट था, म्यूजिक में. सो आई विल वर्क ऑन इट टू.. मेय बी आई विल जॉइन
सम काइंडा म्यूजिक और कल्चरल सोसाइटी इन कॉलेज..!!
धीरे-धीरे दिन पास आ रहे थे, वहां जाने के. एक नयी जिन्दगी शुरू होने वाली थी. मैं खुश तो रहता ही था, लेकिन इन
दिनों थोडा नर्वस रहता था. ओवियस्ली पहली बार घर से बाहर रहने को जा रहा था. अब तक रहने का कोई जुगाड़ नहीं था , यही कोई 7-8
दिन रह गए होंगे. तब ख्याल आया, यार कुछ जुगाड़ करना चाहिए रहने के लिए. मैंने पा से कहा- "पा, पी.जी. वुड बी फाइन आई गेस..!!"
मैं उनको जताना चाहता था की मैं सर्वाइव कर लूँगा इवन पी.जी में भी. लेकिन मैं अन्दर से खुश था की अगर ऐसा हो गया तो अच्छा रहेगा
काफी टाइम बच जाएगा पढने के लिए. हंसिये मत, स्टार्टिंग का जोश था वो, हाँ तो उस समय पढने का ही ख्याल आया, गौर कीजियेगा
बचे हुए टाइम में..!! :p लेकिन नहीं, मेरी दाल नहीं गली. पा ने अपना फैसला सुनाया- "तू खुद खाना बना के रहेगा..!! क्या दिक्कत है
उसमें..? खुद बनाएगा, अच्छा ही बनाएगा. और अगर अच्छा बनाएगा तो अच्छा ही खायेगा. तू उधर अच्छे से रहेगा-खायेगा, तो यहाँ हम लोग चैन
से सो सकेंगे. नहीं तो हमेशा चिंता लगे रहेगी. एक तो तेरा शरीर ऐसा है कि..."
मैं चुप था, बस कह दिया.. ठीक है..!! नहीं आई वाज'न्ट हैप्पी एट देट मोमेंट. बट इफ यू आस्क मी नाउ, आई वुड टेल- देट वाज ग्रेट स्टेप!
मैंने अपने बड़े भैया को कॉल किया, जैसा की वो मुझसे पहले दिल्ली में रह चुके थे, तो उनके कांटेक्ट में होंगे कई बन्दे!
यू नो, हु कैन फाइंड मी अ प्लेस टू स्टे! मैंने बता दिया की मेरा कॉलेज धौलाकुआं में है, सो इट वुड बी ग्रेट इफ यू फाइंड सम प्लेस नियर बाय.
दो-तीन के बाद उनको कॉल आता है कि, ड्यूड! देयर इज प्लेस 'नारायणा' , व्हिच इज आल्सो नियर टू योर कॉलेज. एक ही बंदा है वो, हु इज वर्किंग टू.
और हाँ वो भी बिहार का है. आई गेस! इट विल बी फाइन..विल नॉट इट..?
ही गेव मी हिज कांटेक्ट नंबर. पा न उससे मैथली (भाषा) में ही बात करना ठीक समझा. सब ठीक ही चल रहा था. सो अब रुक्सत का पल आ गया था.
रात को ही मैं बस से निकला. पा ही आये थे, स्टैंड तक छोड़ने. काफी कुछ था उनकी आँखों में. उम्मीदें, आशाएं, गर्व, प्यार और चिंता भी. मैं शायद रो देता.
लेकिन, नहीं रोया मैं..!! लड़का ही था. जैसा हमें बचपन में कहा जाता है- 'लड़के नहीं रोते हैं, बच्चे.!!' कुछ ऐसा ही हुआ.
मैं उनको कहना चाहता था- "पा, आई विल डू माय बेस्ट". लेकिन वो भी अनकहा रह गया. हिम्मत नहीं कर सका.
बस सुबह आनंद विहार पहुँच गयी. मैं उतरा, मेट्रो स्टेशन गया. नहीं, इट वाजन्ट माय फर्स्ट राइड. आई हेड डन बिफोर. ब्लू लाइन के ही
शादीपुर मेट्रो का टोकन लिया. वहां कुछ यही 40 मिनट बाद मैं उतर गया. एज आई वाज इंस्ट्रकटेड बाय माय अपकमिंग रूम पार्टनर.
फिर भी श्योर होने के लिए, आई आस्कड द डायरेक्शन टू अ गर्ल. देयर वाज डीटीसी बस स्टैंड. वहां पहुंचा. शायद 753 रूट की बस थी.
मैंने पूछा- अंकल! पायल सिनेमा जायेगी..? एंड ही नोडेड. कुछ सेकंड बाद मैंने खुद को और मेरे पिठ्ठू बैग, एक छोटा ब्रीफ़केस, (जिसमें
मोस्टली किताबें रखी थी) , और एक बैग (जिसमें बिस्तर और कपड़े थे ) को अन्दर पाया.
"कितने का टिकट लगेगा..?", मैंने पूछा.
"5 का", आई वाज सप्राइज्ड विथ हिज आंसर. सोचा- बस! 5 रु..??
( देट वाज माय फर्स्ट टाइम टू इन डीटीसी )
उसने मेरी और टिकट बढ़ाया.
"अंकल! बता दीजियेगा जब स्टॉप आ जाए.." कह कर मैं सामान को गेट पर से हटाने लगा.
अभी मुझे बस में 5 मिनट भी नहीं हुए थे, जब उसी ने कहा-
"पायल सिनेमा वाले उतर जाओ, स्टॉप आ गया भई!!"
मैं अपना तीनों सामान ले कर उतरा. वहां रिक्शे वाले से गुरुद्वारा के बारे में पूछा..
वो कुछ बता तो रहा था. लेकिन मैंने सोचा आई शुड कॉल हीम.
तो भैया जो की मेरे अपकमिंग रूम मेट होने वाले थे, शिवम नाम था उनका.. उन्होंने कहा की फ़ोन रिक्शे वाले को दो, मैं उसे समझा देता हूँ.
तो फिर एक मिनट बाद मैं रास्ते में था. और यहाँ किसी अजनबी की तरह अपने चारों ओर देख रहा था. चीजों को याद रखने की कोशिश कर रहा था.
स्टॉप से पीछे की ओर पहला लेफ्ट, देन एक टंकी के पास से लेफ्ट.. देन..
मैं ये भी सोच रहा था, कि कैसे होंगे वो शिवम भैया! कैसा रहेगा मेरा सफ़र..??
ज्यादा दूर तो नहीं था शायद! एक बोर्ड के पास एक आदमी को खड़ा देखा मैंने, बोर्ड के ऊपर किसी गाँव का नाम था.
"लो भैया, हम आ गए, जहाँ फ़ोन पे उन्होंने छोड़ने को कहा.."
टी-शर्ट और शॉर्ट्स में, चेहरे पर बिहार वाली मासूमियत लिए उस आदमी को मैंने अपनी ओर बढ़ते देखा.
"शिवम भैया...??", मैंने पूछा.
"हाँ."
"नमस्ते!" देन वी शूक्ड आवर हैंड्स टू. मैंने रिक्शे वाले को 30रु दिए. और वो मुड़ गया वापस.
गली ज्यादा चौड़ी नहीं थी, उन्होंने मेरे ब्रीफ़केस को अपने हाथों में लिए. अच्छा लगा मुझे!
हम बढ़ते गए, और गलियाँ और पतली होती गयी. ज्यादा दूर नहीं था, वहां से. फिर कुछ देर बाद मैं खुद को एक बड़ी से 6 स्टोरी बिल्डिंग को देखते
हुए पाया.
"कौन सा फ्लोर है भैया अपना ..?" मैंने पुछा.
"4th" , उन्होंने कहा.
रास्ते में बातें शुरू हो गयी थी हमारे बीच. सफ़र कैसा रहा, उन्होंने पुछा था मुझसे.
48 सीढियां चढ़ने के बाद, हम एक लॉक्ड डोर के सामने रुक गए.
"लो, आ गया." उन्होंने कहा. हम दोनों रूम के अन्दर घुसे.
एक सिंगल बेड, जिसमें दो बन्दे सो सकते थे. बेड के आगे छोटा सा टीवी. टीवी के पास छोटा सा म्यूजिक सिस्टम. और हाँ, वहां भी फोग्ग चल रहा था.
:D दो-तीन फोग्ग के कैन थे. एक बेड के बाद उतने ही साइज़ का बेड लग सकता था, इतनी स्पेस बची थी. आगे छोटा सा किचन था.
जिसमें दो आदमी खड़े होकर आराम से खाना बना सकते थे. रूम बैचलर के हिसाब से काफी साफ़ था. चीज़ें लगभग अपनी जगह पर थी.
सबसे कूल चीज़ वहां की बालकनी थी. हाइट काफी ठीक थी. उसको लोहे के रॉड से फेंस किया गया था, जिस्पें काला पेंट चढ़ा था.
वहां एक स्टूल लगा था. जिसपे बैठ के घूमा जा सकता था. यानी वो घूमने वाली स्टूल था, बिना व्हील्स के. पास में ही वहां एक स्कूल भी था.
जिसका ग्राउंड काफी छोटा था. पास में ही वाशिंग मशीन था. हालत से वो ख़राब ही लग रहा था. किचन में कोने पे एक सिंक लगा था.
दो प्लेटफार्म वाला गैस था. और शायद सिलेंडर वो छोटा वाला ही यूज़ कर रहे थे.
शिवाजी (डी.यू.) से ही उन्होंने अपना ग्रेजुएशन किया था, कॉमर्स से. किसी प्राइवेट बैंक में मेनेजर थे.
अच्छा लगा मुझे अपना नया घर. वो 10 के आसपास ऑफिस को निकल गए. इधर मैंने ब्रेकफास्ट कर सबको फ़ोन कर दिया.
मम्मी,पा और दादा जी से फ़ोन पे बात कर के मैंने टीवी ऑन किया. लेकिन नींद आ रही थी, तो मुझे सोने जाना पड़ा.
लगभग शाम को मै 4-5 जगा. उठ के हाथ मैं पानी की बोटल लेकर मैं उस स्टूल पे जा बैठा. उस स्कूल में कराटे की क्लास्सेज चल
रही थी. मुझे अच्छा लग रहा था, वहां बैठना. एक शान्ति थी उस पल में. रात को भैया आये. वी कुक्ड आवर डिनर.
उन्होंने मुझसे पुछा- खाना बना लेते हो, नीकू..?
हाँ, इसी नाम से बुलाने लगे मुझे! अच्छा लग रहा था उनसे ये नाम सुनना..
"नहीं भैया, ज्यादा कुछ नहीं. खिचड़ी बना लेता हूँ, चाय बना लेता हूँ, बनी रोटी पे घी लगा लेता हूँ तवे पर और हाँ मैग्गी भी."
वो हँस पड़े. "और रोटी-चावल..?"
"चावल तो बना लेता हूँ, लेकिन रोटी बनानी नहीं आती."
"चल कोई न, सीखा दूंगा मैं."
"चाय पीता है..?"
"नहीं भैया, इन्फेक्ट घर पर कोई नहीं पीता है"
"अच्छा...?"
"हाँ.."
हमने खाना लगाया. भैया ने टीवी ऑन किया. और स्टार प्लस लगाया..
कोई डेली सोप आ रहा था. नाम याद नहीं मुझे.
मुझे हंसी आ रही थी.. आखिर पहला बंदा जो मिला था, डेली सोप देखने वाला.
आई मीन नया होता है कुछ.. यहाँ के सीरियल्स में..? वही लव अफेयर, फिर शादी, फिर सास बहु, फिर लीड एक्टर का याद्दास्त जाना,
फिर पुनर्जन्म, फिर प्लास्टिक सर्जरी, फिर उनके बच्चे, और फिर वही कहानी... :D :D
और फिर हम सो गए. डे आफ्टर नेक्स्ट डे, मेरा कॉलेज स्टार्ट होने वाला था.. आई वाज एक्साइटेड एंड लिटिल नर्वस टू..
टू बी कंटिन्यूड......
(हालांकि इसमें फोटो पहले सेमेस्टर की है, लेकिन इसमें मैं नहीं शामिल हूँ. लेफ्ट से ओम, रिया और विकाश, मेरे क्लासमेटस)
आपके कमेंट्स सादर आमंत्रित है....
:- #MJ_की_कीपैड_से
:- #MJ_की_कीपैड_से
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