रास्ता पता है मगर..मंजिल से अनजान हूँ

रास्ता पता है मगर..मंजिल से अनजान हूँ

Saturday, 25 June 2016

दिल्लीफरनमा पार्ट- 3 - 'द स्टार्टिंग' (The Starting)

#दिल्लीफरनमा पार्ट- 3
23/July/2012
  फाइनली आज वो सुबह आ ही गया. 6.30 बजे ही आँख खुल गयी थी. थोड़ी देर और सोना चाहता था. लेकिन
एक्साइटमेंट में नहीं सो पाया. ब्रेकफास्ट करने के बाद शिवम भैया (रूम पार्टनर) ऑफिस को निकल पड़े.
और मैं भी लगभग 9.15 बजे बस स्टॉप की और चल पड़ा. कॉलेज पहुँचने पर मैंने कमल भैया को कॉल किया.
और पूछा की, एनी स्पेशल थिंग यू वुड लाइक टू टेल मी..?? बोले- "किसी से अकड़ना नहीं, किसी से दबना नहीं"
उन्होंने मुझे नानकमत्ता (खटीमा से लगभग 16 कि.मी दूर) के एक बन्दे से मिलाया. महेश नाम था उसका. ही वाज इन
इलेक्ट्रॉनिक्स. ही वाज फ्रेशर टू. आई चेक्ड नोटिस बोर्ड, देट वाज नोटिफाइंग स्टूडेंट ऑफ़ आवर कोर्स आर सपोज टू हेड टुवर्ड्स
सेमिनार रूम. सो, मैं और महेश के साथ वहीँ पहुंच गए. काफी भीड़ थी. लगभग 300 के आस-पास तो रहे होंगे बच्चे. हालांकि हॉल का
स्पेस काफी ठीक था. लेकिन तब भी भीड़ काफी महसूस हो रही थी. मैं हॉल के लेफ्ट कार्नर में जा पहुंचा. इधर महेश भी अपने
क्लासमेट्स के साथ मशगूल हो गया. मेरी क्लास का पहला बंदा जो मुझे उस दिन मिला, देट वाज अंकुर चौधरी. फिर धीरे धीरे
हमारे साथ उस दिन दो बन्दे मिल गए अपने कोर्स का, चेतन और आशीष. काफी सारी लड़कियां भी थी हॉल में. एक को मैंने
नोटिस किया, अपने गर्ल फ्रेंड्स के साथ ग्रुप में खड़ी थी. हाइट भी काफी सही थी. उसकी भी और उसके दोस्तों की.
देट वाज रागिनी (बदला हुआ नाम) बाद में पता चला की वो क्लासमेट ही है. लगभग एक घंटे के बाद हमारे कोर्स के हेड के साथ चार-
पांच फैकल्टीज आई. उन्होंने बताया की डरने की जरुरत नहीं है रैगिंग से. अगर कोई भी सीनियर परेशान करता है, तो आप हमारे पास
आइये. शी आल्सो टोल्ड अस टू वर्क हार्ड. इसके बाद सबको एक जूस और बिस्किट का पैकेट दिया गया. और फिर हम चार
मैं, अंकुर, चेतन और आशीष टाइम टेबल नोट करने निकल पड़े. बहुत डिफिकल्ट था वो काम, अगर आपको याद हो.
सारे सब्जेक्ट का शेड्यूल अलग अलग था. बहुत दौड़ भाग हुई थी उस दिन दूंढ़ते-दूंढ़ते. लगभग 1 बजे मैं घर के लिए निकल पड़ा.
मुझे बस के बारे में ज्यादा पता नहीं था, तो मैंने वही स्टॉप पे बैठे एक ताऊ से पूछा- नारायणा के लिए इधर से कौन सी बस जाती है..?
ताऊ बोला- घणी बसे हैं, सारी जावे है. (कुछ ऐसा ही कहा था हरियाणवी में, माफ़ कीजियेगा उतनी अच्छी नहीं हैं मेरी हरियाणवी. सॉरी विकास और नरेशा )
मतलब ये- की यहाँ से सारी बसें नारायणा जाती है. मैं इंतज़ार करने लगा अगली बस का. 711 नंबर की रेड बस आई, मैं चढ़ गया. बस के आटोमेटिक
दरवाज़े बंद हो चुके थे. बस चल चूकी थी. कंडक्टर की तरफ बीस का नॉट बढ़ाते हुए कहा- "भैया! एक नारायणा.."
"भई! गलत बस में चढ़ गया, ये न जाति नारायणा.."
मैं चुप हो गया. एक तो नया नया था, क्या कहता..?
बोला- "भैया रुकवा दो."
"अब अगले स्टॉप पे उतरियो, यहाँ न रुकेगी"
इधर मैं मन में ही उस बुड्ढे को गाली दे रहा था, साला कह नि सकता था की 711, 724, 588, O.M.S और  794 को छोड़कर सारी बसें जाती है.
उसको जी भर कोसने के बाद मैंने कंडक्टर से आगे का रास्ता पूछा. भाई साब! उस बुड्ढे के कारण उस जुलाई की गर्मी में ऑलमोस्ट 1 कि.मी
पैदल चलना पड़ा. फाइनली वहां से बस मिली और मैं नारायणा रिंग रोड पे उतरा. जब मुझे बाद में पता चला की मुझे एक स्टॉप पहले
उतरना था. फिर वहां से वापस पैदल चल के पहुंचा लगभग 1 कि.मी नारायणा गाँव के स्टॉप में. फिर वहां पहुँच के खुद से कहा की
"कल से तुझे, यहीं उतरना है", अच्छे से मैंने उस जगह को याद कर लिया. पता नहीं क्यू मुझे शुरुवात में नारायणा रिंग रोड को समझने में बहुत दिक्कत हुई.
और इस तरह मैं अपने रूम पर पहुंचा. थका हारा. खाना खाने के बाद मैं लुढ़क गया बिस्तर पर.
 (Tuesday- 24.July.2012)
फिर अगले दिन वही 6.30 पर उठा. पहली क्लास लैब थी, कंप्यूटर की. वहीँ मुझे चेतन और अंकुर मिले (कल वाले मेट्स).
हम वहां पहुंचे तो पता चला की लैब नही होगी, क्यूंकि अभी तक कोई थ्योरी क्लास्सेज नहीं हुई थी. वो लैब चार पीरियड्स का था, यानि
55*4=220 मिनट. तो इस बचे टाइम में हम लाइब्रेरी कार्ड बनाने चले गए. मैं लाइब्रेरी से बाहर निकल कर अपना फॉर्म भर रहा था. की तभी किसी ने
मेरे कंधे पे हाथ रख कर कहा- "मंजेश..??" मैं आवाज़ की तरफ मुड़ा. कुछ मेरी जैसी ही फीजिक थी उस बन्दे की. बालों में हल्का तेल लगा के
आया था. उसने खुद को इंट्रोड्यूस किया, क्यूंकि मेरी आँखें अब तक उस को नहीं पहचान पायी थी.
"मनीष... मनीष खोलिया.. खटीमा से ही हूँ मैं"
( #नाम याद रखना, काफी इम्पोर्टेन्ट किरदार है ये, इस सफरनामा का, हालांकि ये बात मुझे उस वक़्त पता नहीं था... जबसे ये बन्दा लाइफ में आया है,
बहुत उथल-पुथल मचाई है साले ने :D सॉरी भाई ;) )
 ## ( ऑलमोस्ट 15 डेज एगो इन खटीमा)
मैं पांडे जी दुकान पे बैठ के गप मार रहा था. दोपहर के यही कोई 12 बजने वाले थे, जब पाण्डेय ने एक बन्दे की तरफ इशारा करके कहा,
"उस लड़के ने भी तेरे कॉलेज में एडमिशन लिया है. अपने इंग्लिश मीडियम का था"
मैंने उसकी तरफ देखा, ज्यादा ध्यान नहीं दिया, चेहरे पर. सोचा कि कौन सा मेरे कोर्स का होगा.. हमारी नज़रें भी मिली.
तो हम एक ही स्कूल से 12th पासआउट थे. फिर भी मैं उसको नहीं जानता था, क्यूंकि वो CBSE से था, और  मैं, Uttarakhand Board
से था.
(Tuesday- 24.July.2012)
 "यार, तेरे को मैंने वही पाण्डेय की दूकान पे देखा था, तेरी बस ये मूछें याद रही मुझे, और अभी उसी को देख के गेस किया..", मनीष बोला.
मैं मुस्कुराया. आफ्टर देट केजुअल मीटिंग, वी एक्सचेंज्ड आवर कांटेक्ट नंबर. वो जनक सिनेमा में रह रहा था.सागरपुर से एक स्टॉप के बाद.
अकेला. सिंगल रूम ले कर.
उस दिन बस मोनिका सूरी की मैथ्स की क्लास हुई. फिर मैं घर के लिए निकल पड़ा. बस से स्टॉप में उतरने के बाद रास्ते में एक किलो आम भी खरीदा.
सोचा, शायद इसे खाने के बहाने ही घर को याद कर लूँगा. हालाँकि उसका टेस्ट उतना अच्छा नहीं था. आई स्टिल रेमेम्बेर देट टेस्ट.
 मैंने पा को अगली सुबह फ़ोन कर के बताया की मैंने दूध और ब्रेड खाया है. मुझे लगा की उनको अच्छा लगेगा सुन के, की कुछ तो खा रहा है न..
लेकिन नहीं, गुस्सा हो गए वो. बोले - अगर दिल्ली में 3 साल काटने है तुझे, तो बेटा तू ये सब खा के बिल्कुल नहीं रह सकता.
एक और सीख मिली उस दिन. बोले - ज्यादा नहीं, कम-से-कम 3-4 रोटी बना लिया कर. कितना टाइम लगता है.! और दाल भी जब जल्दी बन
जाती है, तो वही क्यूँ नहीं बना लेता.
दिल्ली आने से पहले घर वालों से मैंने कुछ क्विक डिश (जो जल्दी से बन जाए लाइक- मैग्गी) सीख के आया था. उनमें से मैग्गी
के अलावा दाल का तड़का बनाना भी था. इसके अलावा कुकर में चावल बना लेता था. रोटी नहीं आती थी. रोटी में कभी श्रीलंका तो कभी
पाकिस्तान का नक्शा बन जाता. माँ से पूछता रहता की आप अच्छी/ताज़ी सब्जियों और ख़राब सब्जियों की पहचान कैसे करते हो..?
वो बताती- लौकी में नाख़ून गड़ाया कर, भींडी को बीच से तोड़ कर देखा कर, लाल और टाइट टमाटर अच्छे होते है. फूल गोभी में उसके
तनें को देख लिया कर, जिसमें तना छोटे से छोटा हो और फूल कुछ बड़ा हो...
  यहाँ कॉलेज मैं हम लोग को p1 क्लास ही नहीं मिल पा रहा था. पता नहीं कहाँ होगा, सब यह सोच रहे थे.. जबकि वो था
आँखों के सामने ही. अगले दिन मैं पहली बार कॉलेज के एल.पी यानी लवर्स पॉइंट पर पहुंचा अपने वो तीन दोस्तों के साथ. वहां हम लोग पहली
बार मलखान उर्फ़ मेड्डी, विनय और उसके दोस्तों से मिले. पता चला की उन सब की ईयर बैक आई थी. सब हरियाणा के बन्दे थे.
हालांकि अभी क्लासेज ठीक से स्टार्ट भी नहीं हुई थी. फिर भी बच्चे तो लगभग पूरे आ रहे थे. एक था- ओम. डार्क काम्प्लेक्सअन था उसका. साथ में
हरदम वो क्रिकेट किट लिए घूमता था. उससे तो नहीं पर किसी से सुनने में आया की वो छपरा (बिहार) का है. आई नोटिस्ड काफी इजी गोइंग बंदा था.
काफी दोस्त बन गए थे, तब तक उसके. एक छोटी हाइट का लड़का था, सर पर वो कपड़े की राउंड टोपी लगाये फिरता था. बड़ा ही #अजीब लगता था, दिखने में.
राहुल (बदला हुआ नाम) तुझे पता है कि मैंने सही #वर्ड का यूज़ नहीं किया. :D अजीब सी हरकतें करता. क्लास में हर वक़्त चहलकदमी करता रहता.
सुनने में आया की उसने क्लास की एक लगभग उसी की हाइट की लड़की श्रेया (बदला हुआ नाम) को प्रोपोज किया एंड दे वेंट फॉर मूवी टू.
पता नहीं कौन था, मेरे कान भरने वाला. :D मैं इधर इन तीनों दोस्तों के बीच ही रहता. उन्हीं के साथ कभी कैंटीन, कभी लाइब्रेरी तो कभी एल.पी
पे टाइम पास करता. अंकुर और आशीष से मेरी अच्छी बनने लगी थी, लेकिन वो तीसरा वाला चेतन बड़ा ही अन्नोयिंग था. ठेठ हरियानिवी बोलता.
मैं उसे समझ नहीं पता, भाई बोल क्या गया यो..? अंकुर मेरठ का था. और आशीष भी हरियाणा का था, लेकिन वो हिंदी में ही बात कर लेता था.
वो चेतन था तो बड़े तेज़ दिमाग का. फिजिक्स के लैब में हम चारों ने अपना ग्रुप बनाया.
  इधर रूम पर मैं, दिन में, कभी पढ़ लिया करता था, मोस्टली टी.वी ही देख के टाइम काटा करता था. और फिर जब पॉवर कट होता था,
तो वही बालकनी में बैठ जाता. स्कूल में बच्चों को कराटे खेलता देखता. कभी-कभी हवा भी मेरे चेहरे से खेल जाती, और मैं मुस्कुरा देता. इधर मनीष से भी
अक्सर फ़ोन पर या कॉलेज में बात होने लगी. मैं जरा अनकम्फर्ट फील करने लगा था, वहां शिवम भैया (रूम पार्टनर) के साथ. मेय बी कॉज ऑफ़
 ऐज डीफ्फ्रेंस. 30 जुलाई(मंडे) को जब स्टार्टिंग की लैब नहीं हुई, तो मैंने सोचा की क्यूँ न मनीष का रूम देख लिया जाए. जैसा की उसने कई बार मुझे बोला
की रूम पर आने को. स्टॉप से 711 पकड़ी. टिकट ले कर सबसे आगे चला गया, ड्राईवर के पास. पूछा मैंने कैसे पहुंचना है- जनक सिनेमा..?
उसने मुझे बताया. सागरपुर उतरने के बाद मैं पैदल ही लोगों से पूछते-पूछते वहां पहुँच गया. थोड़ी देर बाद मनीष आया मुझे रिसीव करने. लगभग 10 मिनट
के कीचड़ भरे रास्ते और नाले को पार करने के बाद हम उसके रूम पहुंचे. जैसा की उसने बताया था, सिंगल ही कमरा था. आई नोटिस्ड देयर- एक छोटा वाला गैस
था किनारे रखा, अंडे की क्रेट कोने में पड़ी थी, ढेर सारी मैग्गी. ढेर सारी एप्पी फ़िज़ की खाली पड़ी बोतलें, नीचे लगा बिस्तर, सामान और बहुत कुछ अस्त-व्यस्त था.
फर्स्ट फ्लोर पर था रूम. थोड़े देर बाद हम दोनों वहां से कॉलेज के निकल गए.
रात को पा से बात करके मैंने ये डीसाइड कर लिया था कि मैं अब मनीष के साथ रहूँगा. फिर अगले दिन शाम के लगभग 5 बजे तक मैं अपना सामान ले कर
आ गया यहाँ जनक सिनेमा. जब भैया को बताया था की मैं जा रहा हूँ, देन आई डीड नॉट सी एनी हैप्पीनेस इन हीज आईज. उस रात हम दोनों रात के
लगभग 1.30  बजे तक बातें करते करते सोये. तो इस तरह मैं वहां आ गया, जहाँ मैंने दिल्ली के तीनों साल बिताये.
तीनों साल तक एक ही स्टॉप से बसें चढ़ता, उतरता.. स्ट्रेंज.. हाँ..??
  टू बी कंटिन्यूड....
 (हालांकि फोटो कुछ धुंधली और तीसरे सेमेस्टर की है, थोड़ा एडजस्ट कर लीजियेगा :D . मैं अपने फेमस एंग्री
बर्ड की टी-शर्ट में, साथ में आशीष)
:- #MJ_की_कीपैड_से
 आपके कमेंट्स सादर आमंत्रित है...

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